(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

आश्वमेधिकपर्व


॥ श्रीः ॥
14.30. अध्यायः 030
अथानुगीतापर्व-2
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Topics
ब्राह्मणेन स्वभार्यांप्रति हिंसाया अकर्तव्यत्वे महर्षिवचसां प्रमाणीकरणोपयोगितया परशुरामचरित्रकथनारम्भः॥ 1 ॥ रामेण कार्तवीर्ये निहते तदनुयायिभिर्जमदग्नेर्हनम्॥ 2 ॥ ततः क्रुद्धेन रामेण त्रिःसप्तकृत्वः सर्वक्षत्रियहनने तत्पितृभी रामस्य परिसान्त्वप्रयतनम्॥ 3 ॥
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Text

ब्राह्मण उवाच।

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
कार्तवीर्यस्य संवादं समुद्रस्य च भामिनि॥ 14-30-1(93214)
कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रवान्।
येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही॥ 14-30-2(93215)
स कदाचित्समुद्रान्ते विचरन्बलदर्पितः।
अवीकिरच्छरशतैः समुद्रमिति नः श्रुतम्॥ 14-30-3(93216)
तं समुद्रो नमस्कृत्य कृताञ्जलिरुवाचह।
मा मुञ्च वीर नाराचान्ब्रूहि किं करवाणि ते॥ 14-30-4(93217)
मदाश्रयाणि भूतानि त्वद्विसृष्टैर्महेषुभिः।
वध्यन्ते राजशार्दूल तेभ्यो देह्यभयं विभो॥ 14-30-5(93218)
अर्जुन उवाच। 14-30-6x(7838)
मत्समो यदि संग्रामे शरासनधरः क्वचित्।
विद्यते तं समाचक्ष्व यः समो मे महामृधे॥ 14-30-6(93219)
समुद्र उवाच। 14-30-7x(7839)
महर्षिर्जमदग्निस्ते यदि राजन्पुरा श्रुतः।
तस्य पुत्रस्तवातिथ्यं यथावत्कर्तुमर्हति॥ 14-30-7(93220)
ततः स राजा प्रययौ क्रोधेन महता वृतः।
स तमाश्रममागम्य राममेवान्वपद्यत॥ 14-30-8(93221)
स रामप्रतिकूलानि चकार सह बन्धुभिः।
आयासं जनयामास रामस्य च महात्मनः॥ 14-30-9(93222)
ततस्तेजः प्रजज्वाल रामस्यामिततेजसः।
प्रदहन्रिपुसैन्यानि तदा कमललोचने॥ 14-30-10(93223)
ततः परशुमादाय स तं बाहुसहस्रिणम्।
चिन्छेद सहसा रामो बहुशाखमिव द्रुमम्॥ 14-30-11(93224)
तं हतं पतितं दृष्ट्वा समेताः सर्वबान्धवाः।
असीनादाय शक्तीर्श्च भार्गवं पर्यधावयन्॥ 14-30-12(93225)
रामोऽपि धनुरादाय रथमारुह्य सत्वरः।
विसृजञ्शरवर्षाणि व्यधमत्पार्थिवं बलम्॥ 14-30-13(93226)
ततस्तु क्षत्रियाः केचिज्जमदग्निं निहत्य च।
विविशुर्गिरिदुर्गाणि मृगाः सिंहार्दिता इव॥ 14-30-14(93227)
तेषां स्वविहितं कर्म तद्भयान्नानुतिष्ठताम्।
प्रजा वृषलतां प्राप्ता ब्राह्मणानामदर्शनात्॥ 14-30-15(93228)
एवं ते द्रविडाऽभीराः पुण्ड्राश्च शबरैः सह।
वृषलत्वं परिगता व्युत्थानात्क्षत्रधर्मतः॥ 14-30-16(93229)
ततश्च हतवीरासु क्षत्रियासु पुनः पुनः।
द्विजैरुत्पादितं क्षत्रं जामदग्न्यो न्यकृन्तत॥ 14-30-17(93230)
एकविंशतिमे याते रामं वागशरीरिणी।
दिव्या प्रोवाच मधुरा सर्वलोकपरिश्रुता॥ 14-30-18(93231)
रामराम निवर्तस्व कं गुणं तात पश्यसि।
क्षत्रबन्धूनिमान्प्राणैर्विप्रयोज्य पुनः पुनः॥ 14-30-19(93232)
तथैव तं महात्मानमृचीकप्रमुखास्तदा।
पितामहा महाभाग निवर्तस्वेत्यथाब्रुवन्॥ 14-30-20(93233)
पितुर्वधममृष्यंस्तु रामः प्रोवाच तानृषीन्।
नार्हन्तीह भवन्तो मां निवारयितुमित्युत॥ 14-30-21(93234)
पितर ऊचुः। 14-30-22x(7840)
नार्हसे क्षत्रबन्धूंस्त्वं निहन्तुं जयतांवर।
नेह युक्तं त्वया हन्तुं ब्राह्मणेन सता नृपान्॥ ॥ 14-30-22(93235)

इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि अनुगीतापर्वणि त्रिंशोऽध्यायः॥ 30 ॥

Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Footnotes
7-30-15 तेषामुपरतं कर्मेति ट.पाठः॥ 7-30-16 व्युत्थानात्क्षत्रधर्मिण इति झ.पाठः॥


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